Bharatiya Nyaya Sanhita:Ek Kavya Khand

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  • Author:  Anand Kumar Tripathi
  • Product Code: 978-93-47500-58-9
  • Binding: Paper Back
  • Edition: 1st
  • No of Pages: 348
  • Year of Publication: 2025
  • ISBN: 978-93-47500-58-9

Description

विधि का ज्ञान आज के सभ्य समाज और तकनीकी युग में हम सबकी जरूरत बन गयी है, पर किताबों की दुनिया में समेकित एवं लिपिबद्ध विधिक प्रावधान इतने जटिल एवं क्लिष्ट हैं, जो आम मानस की समझ से कोसों दूर हैं। कभी-कभी तो विधि के क्षेत्र से सम्बंधित विशेषज्ञों को भी कानून की भाषा टेढ़ी खीर सी लगती है, ऐसा मेरा अपना अनुभव है। इन्ही बातों को केन्द्रित करते हुए मैंने भारतीय न्याय संहिता की रचना चौपाई विधा/काव्यात्मक रूप में करके आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इस पुस्तक की विधा काव्यात्मक है,इसका नाम “ भारतीय न्याय संहिता : एक काव्य खंड” है  और लेखक इसके माध्यम से न्याय संहिता में उपबंधित धाराओं को बड़े ही सामान्य भाषा में व्याख्यायित करने का प्रयास किया है, जो आज की आवश्यकता है। प्रांतीय भाषाओं में पठन-पाठन और लेखन का असर पाठक और आम जन मानस के मस्तिष्क में बखूबी असर करता है। भारतीय ज्ञान परम्परा (Indian Knowledge System-IKS) के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत पुस्तक एक प्रमुख स्रोत है,जो भारत में अपने तरह का प्रथम प्रयास है ।

 

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारतीय न्याय संहिता में 20 अध्याय और 358 धाराएँ हैं। इस पुस्तक में अध्याय की जगह सोपान का प्रयोग किया गया है और सम्बंधित अध्यायों के प्रावधानों को सर्वप्रथम काव्यात्मक रूप में उल्लिखित किया गया है और तत्पश्चात उसे सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है। संदर्भित प्रावधान जिस धारा के अंतर्गत आते हैं उसका उल्लेख व्याख्या में दिया गया है। अर्थात लेखक ने न्याय संहिता के सभी उपबंधों को क्रमवार तरीके से इस पुस्तक में पिरोया है। सर्वप्रथम उपबंध को गेय पदों में लिखा गया है जिसकी कुल संख्या 765 है। तत्पश्चात व्याख्या में सम्बंधित प्रावधान जिस धारा में वर्णित है उसका उल्लेख किया गया है। जहां कहीं संहिता में व्याख्या की आवश्यकता नहीं महसूस की गयी है ऐसे प्रावधानों के लिए बेयर ऐक्ट की भाषा का प्रयोग किया गया है। लेखक का स्पष्ट आशय है कि प्रस्तुत पुस्तक सभी स्तर के पाठकों के समीप हो और संहिता के प्रावधानों को समझने में सक्षम सिद्ध हो सके।

 

यहाँ पर एक बात यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि लेखन शैली सरल, सुग्राह्य एवं स्पष्ट है और प्रत्येक वर्ग को ध्यान में रखकर लिखी गयी है, चाहे वह विद्यार्थी हों या अध्यापक या नौकरशाह या अधिवक्ता या न्यायाधीश या आम नागरिक यह पुस्तक सबके लिए उपयोगी सिद्ध होगी ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।

भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत नए प्रावधानों के समेकन के साथ-साथ दण्ड के प्रावधानों को कठोर, तर्कसंगत और न्यायसंगत बना दिया गया है और साथ ही सुधारात्मक दण्ड के सिद्धांत को प्रमुखता देते हुए सामुदायिक सेवा के रूप में दण्ड के प्रकार में जोड़ा गया है। भारतीय दण्ड संहिता में सामुदायिक सेवा को दण्ड के प्रकार में नहीं सम्मिलित किया गया था। किन्तु अब भारतीय न्याय संहिता में कुछ नए अपराध को सम्मिलित एवं परिभाषित किया गया है। इससे दंड के सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा सकेगा। इसका तात्पर्य यह है कि भारतीय न्याय संहिता के मूल में ‘न्याय’ है न कि ‘दंड’। यहाँ तक कि भारतीय न्याय संहिता का ना तो अंग्रेजीकरण किया जा सकता है और ना ही अनुवादीकरण। संहिता के शीर्षक मात्र में ही भारतीय संस्कृति के विचार स्वतः अंतर्निहित है। अतः वर्तमान सरकार ने कानून के आधुनिकीकरण के साथ साथ भारतीयकरण भी किया है जो अब ब्रिटिशीकरण की अवधारणा से मुक्त है।

 

 

लेखक ने प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय संस्कृति, धर्मशास्त्र, वेद, रामचरितमानस, स्मृतियों एवं टीकाओं का बड़े ही सुंदर तरीके से कानून के प्रावधानों के साथ सामंजस्य बिठाया है। इसमें से कुछ प्रावधानों का जिक्र मैं करना चाहूँगा। जैसे- वशिष्ठ स्मृति, कुरान और अन्य धर्म ग्रंथों में आत्मरक्षा के सिद्धांत पर जो चर्चा हुई है उसे ही न्याय संहिता में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में विधि के रूप में जगह मिली है। यहाँ पर यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि ‘ईश्वर उनकी रक्षा करता है जो अपनी रक्षा स्वयं करता है। अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च। अजापुत्रं बलिं दद्याद्देवो दुर्बलघातक:॥ अर्थात न घोड़े की, न हाथी की, न ही बाघ की, बलि दी जाती है, बकरे की बलि दी जाती है। अर्थात अपने को कमजोर बनाना कमजोरी की निशानी है जो हमेशा अपने लिए घातक सिद्ध हो सकती है। यह प्रसंग आत्मरक्षा के संदर्भ में प्रलक्षित रूप से युक्तयुक्त है, जो मात्र संदर्भ के लिए उद्धृत किया गया है।

स्त्री के विरुद्ध जघन्य मामलों में अपराध के मामलों में न्याय के सिद्धांत की चर्चा रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में वर्णित है।

 

अनुज वधू भगिनी सुत नारी।

सुनु सठ कन्या सम ए चारी। ।

इन्हहिं कुदृष्टि विलोकइ जोई।

ताहि वधे कछु पाप ना होई। ।

 

श्रीरामचंद्रजी ने बाली से कहा कि हे मूर्ख अनुज की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी और कन्या ये चारों एक जैसे हैं अर्थात समान हैं। इनको जो बुरी दृष्टि से देखता है उनका वध करने में कोई पाप नहीं है। अर्थात अपराधी को मृत्यु दंड देने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए और इसे यदि जघन्य से जघन्यतम अपराध की संज्ञा दी जाय तो गलत ना होगा। इस प्रकार संहिता के कुछ प्रावधानों को धर्म और संहिता के साथ सामंजस्य स्थापित करने का सफल प्रयास किया गया है,जो पारंपरिक शिक्षा को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा।

 

सामान्य अपवाद के अंतर्गत बालकों के कृत्य को आपराधिक दायित्व से मुक्त प्रदान किया गया है। इस संदर्भ में तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के परशुराम-लक्ष्मण संवाद का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जिसमें परशुराम राम द्वारा धनुष तोड़े जाने पर क्रोधित हो अपने गुस्से को भरी सभा में प्रकट कर रहे थे, लोगों को भला बुरा कह अपनी वीरता का बखान कर रहे थे। इस पर लक्ष्मण से न रहा गया और वे परशुराम से तर्क वितर्क करने लगे। तब परशुराम ने कहा कि ‘मैं तुम्हें बालक समझ कर दंडित नहीं कर रहा हूँ, आप क्या मुझे मुनि और मूर्ख ही समझ रहे हैं’।

 

पिछले दिनों धर्म और जातीय हिंसा के मामले बहुत बढ़े हैं जिसमें उग्र भीड़ द्वारा सामूहिक अपराध किया जाता है जिसे भीड़ द्वारा भाषा, निवास स्थान, धर्म, समुदाय और वर्ग के आधार पर कारित अपराध (मॉब लिन्चिंग) कहा जाता है। भारत सरकार के सकारात्मक पहल से ऐसा पहली बार हुआ है जिसमें इस तरह के आपराधिक कृत्य से निबटने के लिए संहिता में प्रावधान किया गया है और न्याय संहिता को संवेदनशील बनाया गया है।

 

भारतीय न्याय संहिता का नया कलेवर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हो, इस बात को दृष्टिगत करते हुए नए प्रावधानों को समाहित किया गया है। जैसे – संगठित अपराध,लघु संगठित अपराध, आतंकवादी कृत्य, भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरा कारित करने वाले कृत्य इत्यादि। भारतीय दंड संहिता में धारा 124-क के अंतर्गत राजद्रोह का प्रावधान था, जो अब भारतीय न्याय संहिता में नहीं है, किन्तु ऐसा कृत्य जो भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरा कारित करता हो, वाणी संचार या अन्य माध्यमों से विघटनकारी एवं अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला वक्तव्य देता हो जैसे प्रावधान लाए गए हैं जो पूर्ण रूप से भारतीय संस्कृति के अनुरूप कानून को प्रोत्साहित करता है एवं ब्रितानी कानून की मानसिकता से मुक्ति प्रदान करता है।

पाठकों की सुविधा के लिए परिशिष्टि ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ में क्रमश: भारतीय न्याय संहिता एवं भारतीय दंड संहिता का विगतवार विवरण, भारतीय न्याय संहिता में जोड़े गए नए प्रावधानों का विवरण, भारतीय दंड संहिता से निकाले गए प्रावधानों का विवरण जैसे विषयों का उल्लेख किया गया है जिसके माध्यम से भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों को भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के साथ साथ समझने में मदद मिलेगी।

पाठकों से अनुरोध है कि वे इस पुस्तक के संदर्भ में अपने मूल्यवान सुझाव देने की कृपा करें एवं यदि कहीं भी इस पुस्तक में कोई त्रुटि संज्ञान में आए तो लेखक के ध्यान में लाने की कृपा करने का कष्ट करेंगें । लेखक द्वितीय संस्करण में आपके सुझावों को सहर्ष स्थान देने का प्रयास करेगा । हिन्दी माध्यम से अध्ययन करने वालों पाठकों के लिए यह पुस्तक वरदान सावित होगी ऐसा मेरा विश्वास है ।

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